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सीमा-पार एवं अंतरराष्ट्रीय मामले
सीमा-पार अनुबंध, विदेश में तामील, और भारत में विदेशी निर्णयों व माध्यस्थम् पंचाटों का प्रवर्तन।
DLP का चैम्बर: नं. 548, ए ब्लॉक, हाई कोर्ट, लखनऊ
कानून क्या कहता है
अंतरराष्ट्रीय पहलू वाले मुवक्किलों को प्रायः सीमा-पार अनुबंधों और विधि-चयन व अधिकारिता खंडों, विदेश में अदालती कागज़ों की तामील (भारत हेग तामील अभिसमय का पक्षकार है), और भारत में विदेशी निर्णयों के प्रवर्तन में सहायता चाहिए होती है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 44A के अंतर्गत अधिसूचित 'व्यतिकारी राज्यक्षेत्र' के उच्चतर न्यायालय की डिक्री भारत में भारतीय डिक्री की तरह निष्पादित हो सकती है; अन्य विदेशी निर्णयों के लिए सामान्यतः वाद आवश्यक है। भारत द्वारा अधिसूचित न्यूयॉर्क अभिसमय देशों के विदेशी माध्यस्थम् पंचाट माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के भाग II के अंतर्गत लागू होते हैं। विदेशी निवेश और प्रेषण FEMA, 1999 के अधीन हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या विदेशी अदालत का निर्णय भारत में लागू हो सकता है?
यदि यह धारा 44A CPC के अंतर्गत व्यतिकारी राज्यक्षेत्र के उच्चतर न्यायालय की डिक्री है, तो सीधे निष्पादित हो सकती है। अन्यथा निर्णय के आधार पर वाद दायर होता है, और धारा 13 CPC के बचाव लागू होते हैं।
विदेशी माध्यस्थम् पंचाट कैसे लागू होता है?
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 के भाग II के अंतर्गत आवेदन दायर करके। प्रवर्तन केवल धारा 48 के सीमित आधारों पर अस्वीकार किया जा सकता है।
विदेश में किसी पर अदालती कागज़ों की तामील कैसे होती है?
सदस्य देशों के लिए हेग तामील अभिसमय के माध्यमों से, या द्विपक्षीय व्यवस्थाओं और CPC की प्रक्रिया से।
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