व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं क्षति
बच्चों की अभिरक्षा एवं संरक्षकता
बच्चों की अभिरक्षा, मुलाक़ात और संरक्षकता, जो बच्चे के कल्याण के आधार पर तय होती है।
DLP का चैम्बर: नं. 548, ए ब्लॉक, हाई कोर्ट, लखनऊ
कानून क्या कहता है
अभिरक्षा और संरक्षकता मुख्यतः संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 और हिंदुओं के लिए हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 से, तथा वैवाहिक मामलों में अदालत की अभिरक्षा संबंधी शक्तियों से नियंत्रित होती है। हर मामले में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है। अदालत एक माता-पिता को भौतिक अभिरक्षा और दूसरे को मुलाक़ात या साझा समय दे सकती है, और बच्चे के शरीर या संपत्ति का संरक्षक नियुक्त या घोषित कर सकती है। लखनऊ में ये मामले कुटुंब न्यायालय सुनता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अदालत अभिरक्षा कैसे तय करती है?
बच्चे के कल्याण के आधार पर: आयु, स्वास्थ्य, शिक्षा, भावनात्मक संबंध, हर घर की स्थिरता और, बच्चे के पर्याप्त परिपक्व होने पर, उसकी अपनी इच्छा।
क्या दूसरा माता-पिता बच्चे से मिल सकता है?
सामान्यतः हाँ। जब तक इससे बच्चे को हानि न हो, अदालत प्रायः अभिरक्षा न रखने वाले माता-पिता के लिए मुलाक़ात, वीडियो कॉल या छुट्टियों का समय तय करती है।
क्या अभिरक्षा आदेश बदला जा सकता है?
हाँ। परिस्थितियाँ बदलने और बच्चे के कल्याण की आवश्यकता होने पर अभिरक्षा आदेश बदले जा सकते हैं।
संबंधित सेवाएँ
तलाक
आपसी सहमति से या वैधानिक आधारों पर तलाक, और भरण-पोषण, अभिरक्षा व सामान के निपटारे।
भरण-पोषण एवं निर्वाह-व्यय
पति/पत्नी, बच्चों या माता-पिता द्वारा भरण-पोषण के दावे, और उनका प्रवर्तन।
पारिवारिक विवाद एवं घरेलू हिंसा
घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत संरक्षण, निवास और अन्य आदेश, और संबंधित पारिवारिक विवाद।