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आपराधिक एवं साइबर कानून

आपराधिक विचारण – जिला न्यायालय

मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालयों में विचारण के दौरान बचाव, आरोप तय होने से निर्णय तक।

DLP का चैम्बर: नं. 548, ए ब्लॉक, हाई कोर्ट, लखनऊ

कानून क्या कहता है

आपराधिक विचारण मजिस्ट्रेट के समक्ष या गंभीर अपराधों में सत्र न्यायालय के समक्ष होता है। आरोप पत्र के बाद अदालत यह सुनती है कि आरोप तय किया जाए या अभियुक्त को उन्मोचित किया जाए। आरोप तय होने पर अभियोजन अपने साक्ष्य प्रस्तुत करता है और बचाव पक्ष उसके गवाहों से प्रतिपरीक्षा करता है। फिर अदालत अभियुक्त से साक्ष्य के बारे में प्रश्न पूछती है, अभियुक्त बचाव साक्ष्य दे सकता है, और निर्णय से पहले दोनों पक्ष बहस करते हैं। अभियोजन को अपना मामला युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करना होता है। विचारण में कितना समय लगेगा, यह तथ्यों और अदालत पर निर्भर करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आपराधिक विचारण के चरण क्या हैं?

आरोप पत्र, आरोप या उन्मोचन पर सुनवाई, आरोप तय होना, प्रतिपरीक्षा सहित अभियोजन साक्ष्य, अदालत द्वारा अभियुक्त से प्रश्न, बचाव साक्ष्य, अंतिम बहस और निर्णय।

किसे क्या साबित करना होता है?

अभियोजन को आरोप युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करना होता है। अभियुक्त को अपनी निर्दोषता साबित नहीं करनी होती, यद्यपि कुछ कानून विशेष तथ्यों के लिए अभियुक्त पर विशिष्ट भार डालते हैं।

यदि मैं अधिवक्ता का खर्च न उठा सकूँ तो क्या विधिक सहायता मिल सकती है?

हाँ। संविधान के अनुच्छेद 39A और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत जो अभियुक्त अधिवक्ता का खर्च नहीं उठा सकता, वह अदालत या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से अधिवक्ता माँग सकता है।

निर्णय के बाद क्या होता है?

दोषसिद्धि होने पर अदालत सज़ा पर अभियुक्त को सुनती है। कोई भी पक्ष कानून द्वारा दी गई समय-सीमा में अपील कर सकता है। दोषमुक्ति होने पर कुछ मामलों में राज्य या शिकायतकर्ता भी अपील कर सकते हैं।

इस सेवा को संभालने वाले वकील

Avinash Pratap Singh

मैनेजिंग पार्टनर

अवध बार

भाषाएँ: अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू

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Ambrish Kashyap

सहयोगी अधिवक्ता

लखनऊ बार

भाषाएँ: अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू

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