व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं क्षति
पारिवारिक विवाद एवं घरेलू हिंसा
घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत संरक्षण, निवास और अन्य आदेश, और संबंधित पारिवारिक विवाद।
DLP का चैम्बर: नं. 548, ए ब्लॉक, हाई कोर्ट, लखनऊ
कानून क्या कहता है
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 पीड़ित महिला को मजिस्ट्रेट से संरक्षण आदेश, निवास आदेश (साझा घर में रहने के अधिकार सहित), आर्थिक राहत, अभिरक्षा आदेश और प्रतिकर माँगने की सुविधा देता है। अधिनियम में घरेलू हिंसा में शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार शामिल है। संरक्षण अधिकारी घरेलू घटना रिपोर्ट तैयार करने में मदद कर सकते हैं। पति या उसके संबंधियों द्वारा क्रूरता BNS की धारा 85 (पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 498A) के अंतर्गत अपराध भी है। विभाजन और उत्तराधिकार जैसे अन्य पारिवारिक विवाद दीवानी अदालतों में चलते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
घरेलू हिंसा में क्या आता है?
घरेलू संबंध में रहने वाले व्यक्ति द्वारा शारीरिक, यौन, मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार और आर्थिक दुर्व्यवहार, जैसे महिला को उस धन या घर से वंचित करना जिसकी वह हकदार है।
मजिस्ट्रेट कौन से आदेश दे सकते हैं?
संरक्षण आदेश, निवास आदेश, आर्थिक राहत, बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा और प्रतिकर। मामला लंबित रहते अंतरिम आदेश दिए जा सकते हैं।
क्या अधिनियम लिव-इन संबंधों में महिलाओं पर लागू होता है?
यह 'विवाह की प्रकृति के संबंध' पर लागू होता है। उच्चतम न्यायालय ने डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्माल (2010) में इसके कारक बताए हैं, जैसे काफ़ी समय तक साथ रहना और स्वयं को पति-पत्नी के रूप में प्रस्तुत करना।
क्या पैतृक संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार हैं?
2005 में संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अंतर्गत बेटी जन्म से सहदायिक है और उसके बेटे के समान अधिकार हैं, जिसकी पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) में की।