संपत्ति, किरायेदारी एवं उत्तराधिकार
मकान मालिक–किरायेदार विवाद
उत्तर प्रदेश के किरायेदारी कानून के अंतर्गत किरायानामा, किराया, बेदखली और जमा राशि।
DLP का चैम्बर: नं. 548, ए ब्लॉक, हाई कोर्ट, लखनऊ
कानून क्या कहता है
उत्तर प्रदेश में शहरी किरायेदारी उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 से नियंत्रित है, जो किरायानामा लिखित रूप में आवश्यक करता है और विवादों के निर्णय के लिए किराया प्राधिकारी और किराया अधिकरण का प्रावधान करता है। अधिनियम उन आधारों को बताता है जिन पर मकान मालिक बेदखली माँग सकता है, जैसे किराया न देना, सहमति के बिना शिकमी किरायेदार रखना या परिसर का दुरुपयोग, और किराया संशोधन व सुरक्षा जमा को नियंत्रित करता है। अधिनियम से पहले की किरायेदारी और कुछ परिसरों पर संक्रमणकालीन नियम हो सकते हैं। मकान मालिक को आवश्यक आपूर्ति बंद नहीं करनी चाहिए या विधिक प्रक्रिया के बिना किरायेदार को बेदखल नहीं करना चाहिए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या किरायानामा लिखित होना चाहिए?
हाँ। 2021 का अधिनियम लिखित किरायानामा और उसकी सूचना किराया प्राधिकारी को देना आवश्यक करता है।
किरायेदार को किन आधारों पर बेदखल किया जा सकता है?
अधिनियम में सूचीबद्ध आधार, जिनमें किराये का बकाया, सहमति के बिना शिकमी किरायेदारी, परिसर की क्षति या दुरुपयोग, और अधिनियम में अनुमत परिस्थितियों में मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता शामिल है।
विवाद कहाँ तय होते हैं?
किराया प्राधिकारी के समक्ष, और अधिनियम के अनुसार किराया अधिकरण में अपील।