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आपराधिक एवं साइबर कानून

पुलिस जाँच के दौरान अधिकार

FIR के बाद क्या होता है, और पूछताछ, गिरफ्तारी या तलाशी के समय व्यक्ति के विधिक अधिकार।

DLP का चैम्बर: नं. 548, ए ब्लॉक, हाई कोर्ट, लखनऊ

कानून क्या कहता है

FIR के बाद पुलिस जाँच करती है: बयान दर्ज करती है, दस्तावेज़ और अन्य साक्ष्य एकत्र करती है, और संदिग्धों से पूछताछ या उनकी गिरफ्तारी कर सकती है। सात वर्ष तक के दंड वाले अपराधों में पुलिस को सामान्यतः गिरफ्तारी के बजाय उपस्थिति का नोटिस देना होता है, जब तक कि कानून में बताए आधारों पर गिरफ्तारी उचित न हो (BNSS की धारा 35)। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताए जाने चाहिए, वह अधिवक्ता से परामर्श कर सकता है, किसी संबंधी को सूचना दिलवा सकता है, और उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए। जाँच BNSS की धारा 193 के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट (आरोप पत्र या समापन रिपोर्ट) के साथ समाप्त होती है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या मुझे पुलिस के प्रश्नों का उत्तर देना ही होगा?

आपको झूठी जानकारी नहीं देनी चाहिए, पर किसी को अपने विरुद्ध गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 20(3))। कोई बयान देने से पहले सलाह लें, और हस्ताक्षर करने से पहले उसे पढ़ें।

क्या पूछताछ के दौरान मैं अपने अधिवक्ता से मिल सकता हूँ?

गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, यद्यपि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं (BNSS की धारा 38), और अनुच्छेद 22(1) के अंतर्गत अपनी पसंद के अधिवक्ता से परामर्श का अधिकार है।

पुलिस हिरासत कितने समय तक रह सकती है?

पहले 24 घंटों के बाद हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट का आदेश आवश्यक है। जाँच के दौरान निरोध की कुल अवधि की कानूनी सीमाओं के भीतर, पुलिस हिरासत कुल मिलाकर अधिकतम 15 दिन तक अधिकृत की जा सकती है (BNSS की धारा 187)।

यदि आरोप पत्र समय पर दाखिल न हो तो?

यदि अपराध के लिए कानून द्वारा तय अवधि में जाँच पूरी न हो, तो हिरासत में व्यक्ति 'डिफ़ॉल्ट' जमानत के लिए आवेदन का हकदार हो जाता है, बशर्ते वह आरोप पत्र दाखिल होने से पहले आवेदन करे।

इस सेवा को संभालने वाले वकील

Avinash Pratap Singh

मैनेजिंग पार्टनर

अवध बार

भाषाएँ: अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू

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Ambrish Kashyap

सहयोगी अधिवक्ता

लखनऊ बार

भाषाएँ: अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू

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